पहाड़ी जीवन कैसा होता है….

पहाड़ी जीवन कैसा होता है…

 

प्रकृति की कोख में जन्मे किसी प्राणी का लगाव पहाड़ों से उतना ही गहरा होता है जितना किसी नन्हे शिशु का अपनी माँ की गोदी से । पहाड़ी लोगों कि दिनचर्या चाय कि चुस्की के साथ ही शुरू होती है वो भी स्टील के गिलास में। चाय यहां कि दिनचर्या का अभिन्न अंग है। शायद ही कोई ऐसा पहाड़ी व्यक्ति हो जो चाय के बिना जीवन कि कल्पना भी करता हो, फिर चाहे वह परदेश में ही क्यों न रहता हो। फिर शुरू होती है जिंदगी जीने कि जद्दोज़हद। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी घर के कामों में बराबर हिस्सेदारी निभाते हैं। शारीरिक मेहनत और मानसिक प्रसन्नता पहाड़ी के प्रमुख गुण हैं, जो इन्हे शहरी जीवन से भिन्न करते है। मेरा निजी अनुभव है की हम पहाड़ी लोगो का जीवन खेती बाड़ी पर निर्भर करता है। औद्योगिकीकरण न होने के कारन यहां जिंदगी जीने की जद्दोजहद के लिए शहरों से ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। यहां का हर व्यक्ति प्रत्येक दिन नए संघर्ष से जूझता है अपने और अपने परिवार के बेहतर कल के लिए। सरकारी नौकरियां भी यहां सीमित ही है। सरकार से रोजगार के लिए उम्मीद लगाना भी यहां रेगिस्तान में कुआँ खोदना जितना ही कठिन है।

 

खेती बाड़ी और निजी कार्यों को छोड़कर शहरों की तरफ पलायन, जीवनयापन के अन्य अवसर खोजने का एकमात्र रास्ता नज़र आता है । अस्पतालों की भी कोई खास सुविधा दूर दूर तक नही मिल पाती । कन्धों में लादकर अस्पताल तक पहुंचाया जाता है। पढ़ाई के लिए यहां शहरों की तरह अलग- अलग स्कूलों की न तो सुविधा है

और न ही हर परिवार इसके लिए सक्षम हैं। आज भी बच्चे यहां मीलों दूर पैदल चलकर सरकारी स्कूलों में पड़ने जाते हैं आँखों में कई बड़े सपने संजोये, अपने और अपने परिवार के भविष्य के लिए। शायद अपनी जन्मभूमि, अपने पहाड़ के लिए। इतने संघर्षपूर्ण जीवन के बाद भी इक सुकून है यहां की ज़िंदगी में बनावटीपन से परे है यहां के लोग और यहां का वातावरण। शायद जब तक यहां का शहरीकरण न हो जाये तब तक ही। कभी शहरी ज़िंदगी से थक हार कर बाहरी दुनिया की रेस से परे आज को जीने की इच्छा हो इन पहाड़ों की तरफ जरूर आएं। प्रकृति का प्रत्यक्ष अनुभव करने यहां के संघर्षपूर्ण जीवन का साक्षात्कार करने। प्रकृति के इतने करीब होने का एहसास कितना सुखद होता है यह जानना अपने आप में • एक अलग अनुभूति है।