उत्तराखंड से शादी के लिए डेढ़ सौ बारातियों के साथ पहुंची दुल्हन..

गिरिपार क्षेत्र से कबायली रीति-रिवाज आज के मौजूदा समय में भी प्रचलित है। पूरे देश से हटकर कुछ रीति-रिवाज क्षेत्र के लोग शान के साथ निभा रहे हैं। गिरिपार क्षेत्र की पुरानी वैवाहिक परंपरा जाजड़ा आज भी संजोए हुए है। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए उपमंडल शिलाई के कुसेनू गांव में एक वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न हुआ। जाजड़ा परंपरा के अनुसार संपन्न हुआ वैवाहिक कार्यक्रम में दुल्हन उत्तराखंड की तहसील चकराता के गांव जगथान की थी, जबकि दूल्हा उपमंडल शिलाई के गांव कुसेनु का था जहां दुल्हन करीब 150 बारातियों को साथ बारात लेकर दूल्हे के घर पहुंची। सुनने में थोड़ा अजीब लगता है लेकिन हकीकत है। उत्तराखंड की सुमन जोशी कुसेनु गांव में राजेंद्र पांडेय के घर बारात लेकर आई। विवाह की सारी रस्में दूल्हे के घर निभाई गई।

कन्या पक्ष की ओर से आए बारातियों का शानो-शौकत के साथ सत्कार किया गया। वर के पिता कुंभराम शर्मा व जौनसार से आए बारातियों में सिया राम जोशी, राजेंद्र जोशी, लाल सिंह जोशी का कहना है कि जाझड़ा परंपरा में न तो दूल्हा बारात लेकर जाता है न दुल्हन के घर में फेरे होते हैं। लडक़ी की तरफ से करीब आठ दर्जन बाराती दूल्हे के घर गए। स्थानीय भाषा में इन बारातियों को जाजड़ू कहते हैं। इस जजाड़ा की खास बात यह रही कि यहां नशे पर पूरी तरह पाबंदी रही। शादी में कोई शराब नहीं परोसी गई। केंद्रीय हाटी समिति के महासचिव कुंदन सिंह शास्त्री ने बताया कि यह जनजातीय क्षेत्र की परंपरा है जो गत दिनों हाटी समुदाय की एथनोग्राफिक रिपोर्ट में लिखी गई है। यहां न नशा परोसा जाता है न दहेज लिया दिया जाता है। कन्या पक्ष की बारात का दिलोंजान से मान-सम्मान किया जाता है। इस परंपरा में नारी समाज को अलग दर्जा देकर उन्हें रहिनी भोज दिया जाता है। जाजड़ा परंपरा के रीति-रिवाज से संपन्न हुए इस विवाह में प्राचीन परंपरा देखने को मिली। इन्हीं सभी रस्मों रिवाज से गिरिपार के हाटी जनजाति के हकदार हैं, क्योंकि यहां कुछ परंपराएं व तीज त्योहार पूरे देश से अलग हैं।