एक राजपूत, दूसरा ब्राह्मण! एक CM, दूसरा डिप्युटी

एक राजपूत, दूसरा ब्राह्मण! एक CM, दूसरा डिप्युटी

 

छोटा सा राज्य, मुट्ठी भर जनसंख्या !

 

प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार हुआ है। यह भी प्रथम बार हुआ कि एक ही बेल्ट से दो दिग्गज उतारने पड़े हैं। हमीरपुर की सीमाएं खत्म होते ही ऊना की सीमाएं शुरू हो जाती हैं। नए मुख्यमंत्री हमीरपुर और उप मुख्यमंत्री ऊना से ताल्लुक रखते हैं।

 

यानी यह नए-पुराने हिमाचल को साधने की कोशिश बिल्कुल नहीं है। पार्टी हाई-कमान शायद प्रतिपक्ष के नेता रहे मुकेश अग्निहोत्री की अनदेखी न कर पाई इसलिए एक नया राजनीतिक इतिहास बन गया। जरूरत तो नहीं थी लेकिन मजबूरी अवश्य बन गई होगी। इससे पार्टी हाई कमान के दिल में मुकेश अग्निहोत्री के प्रति सम्मान और स्नेह का अनुमान लगाया जा सकता है। सुक्खू के प्रति तो है ही।

 

मुकेश अग्निहोत्री मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे लेकिन अब ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उन्हें ‘ब्राह्मण’ होना मार गया। प्रदेश में ब्राह्मणों की जनसंख्या 18 फीसद और राजपूतों की करीब 33 फीसद है। शायद यही वजह है कि प्रदेश में सुक्खू को जोड़कर कुल सात मुख्यमंत्री बने जिनमें से छह राजपूत हुए। बावजूद 1985 के बाद कोई राजपूत मुख्यमंत्री सरकार रिपीट न कर सके। शांता कुमार इकलौते ब्राह्मण मुख्यमंत्री थे। दो बार मुख्यमंत्री बने लेकिन दोनों बार कार्यकाल पूरा न कर सके।

 

इतना बताना ठीक रहेगा कि 2011 की जनगणना के अनुसार, प्रदेश की 50.72 प्रतिशत आबादी सवर्णों की है। इनमें से 32.72 फ़ीसदी राजपूत और 18 फ़ीसदी ब्राह्मण हैं। 25.22 फ़ीसदी अनुसूचित जाति, 5.71 फ़ीसदी अनुसूचित जनजाति, 13.52 फ़ीसदी ओबीसी और 4.83 प्रतिशत अन्य समुदाय से हैं। हिमाचल प्रदेश में मुसलमानों की आबादी न के बराबर है, इसलिए यहाँ हिन्दुत्व की राजनीति का ज़ोर नहीं है। कुल आबादी 70 लाख से भी कम है। हुआ सो हुआ! अब आगे की सुध लेनी होगी। वादे बहुत कर लिए हैं और खजाने में कुटिल मुस्कान लिए ठनठन गोपाल बैठे हैं। बसों में महिलाओं के लिए निःशुल्क यात्रा – सुविधा देनी हैं। 1500 रुपये हर महीने और तीन सौ यूनिट बिजली मुफ्त देनी है। पुरानी पेंशन योजना बहाल करनी है और पांच लाख नौकरियां भी देनी हैं। जाने यह सब कैसे हो सकेगा। जादू की छड़ी कहां से लाएंगे ?

 

हालांकि प्रदेश की माली हालात स्वस्थ नहीं हैं तथापि बुलंद इरादे उम्मीदों के बंद किवाड़ खोल देते हैं। शायद ऐसी कठिन परिस्थतियों में दुष्यंत कुमार ने कहा था :

 

“ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो ।

 

अब कोई ऐसा तरीक़ा भी निकालो यारो । कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता,

 

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’ ।

 

जो सिंहासन सुक्खू को मिला है उसमें फूल कम और शूल ज्यादा हैं। कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी पड़ गई है। इसे मिल-जुलकर निभाना होगा। यात्रा बहुत छोटी है। सांस एक बार बंद करके देखिए फिर छोड़ दीजिए, पांच सैकिंड निकल जाते हैं। इसी प्रकार पांच वर्ष निकलते देर न लगेगी। बीच में लोकसभा ‘चुनाव भी होने हैं। यह नई सरकार के लिए बड़ी और कठिन परीक्षा होगी।

 

अतएव इस छोटी यात्रा में मिलकर चलें और एक यादगार यात्रा बना दें। लोगों को आपसे बहुत उम्मीदें हैं।