हिमालय की सबसे ऊंची चोटी चूड़धार की यात्रा हुयी बंद, जानिए कारण

हिमालय की सबसे ऊंची चोटी चूड़धार की यात्रा हुयी बंद, जानिए कारण…

 

देवभूमि हिमाचल के सिरमौर जिले की और बाहरी हिमालय (Outer Himalayas) की सबसे ऊंची पर्वत चोटी, जोकि धार्मिक मान्यता और अपने ट्रैक के कारण विश्वविख्यात है, की यात्रा कल से बैसाखी तक पूर्णरूपेण बंद कर दी गयी है। और वहां रहने वाले समस्त पुजारी परिवार भी वहां से नीचे चल दिए हैं।

 

चूड़धार, धार्मिक मान्यताओं के साथ साथ ट्रैक करने वाले पर्यटकों का भी बेहद प्रिय स्थल है, यंहा शानदार ऐडवेंचर के साथ धार्मिक आस्थाएं भी पूर्ण होती हैं। हर वर्ष चूड़धार पर हजारों यात्री चढाई करते हैं और ये आंकड़ा दिन ब दिन वर्ष दर वर्ष बढ़ता ही जा रहा है।

 

लेकिन अब कल से लेकर जनवरी माह की बैसाखी तक यात्री और ट्रैकरस के लिए, ये यात्रा बंद कर दी गयी है। क्योंकि चूड़धार पर्वत की ऊंचाई जोकि 11950 फुट है, के चलते यहां पर बर्फानी तूफान का डर बना रहता है और पर्यटको के लिए खतरा साबित हो सकता है। आपको बता दें कि अभी इस वर्ष ही तीन बार चूड़धार पर हिमपात हो चुका है। इसी कारण के चलते, फिलहाल यह यात्रा बैसाखी तक स्थगित कर दी गयी है। आईए जानते हैं, इस स्थान के बारे में और इससे जुड़ी।

 

मान्यताओं के बारे में :-

 

चूड़धार पर्वत का उल्लेख जॉन केय द्वारा पुस्तक, द ग्रेट आर्क में किया गया है, जिसमें इसे ‘द चूर’ कहा गया है। इस चोटी से ही जॉर्ज एवरेस्ट 1834 के आसपास हिमालय पर्वतों के कई खगोलीय आंकड़े जमा किए। उस समय वह भारत के सर्वेक्षक जनरल थे। मालूम हो कि माउंट एवरेस्ट को अपना नाम जॉर्ज एवरेस्ट से ही मिला है।

 

सिरमौर, चौपाल, शिमला, सोलन उत्तराखंड के कुछ सीमावर्ती इलाकों के लोग इस पर्वत में धार्मिक आस्था रखते हैं। चूड़धार को श्री शिरगुल | महाराज का स्थान माना जाता है। यहां शिरगुल महाराज का मंदिर भी स्थित है। शिरगुल महाराज सिरमौर व चौपाल के देवता है। चूड़धार पर्वत तक पहुंचने के दो रास्ते हैं।

 

मुख्य रास्ता नौराधार से होकर जाता है तथा यहां से चूड़धार 14 किलोमीटर है। दूसरा रास्ता सराहन चौपाल से होकर गुजरता है। यहां से चूड़धार 6 किलोमीटर है।

 

इस मंदिर के बनने के पीछे एक पुराणिक कहानी जुड़ी है। मान्यता है कि एक बार चूरू नाम का शिव भक्त, अपने पुत्र के साथ इस मंदिर में दर्शन के लिए आया था उसी समय अचानक बड़े-बड़े पत्थरो के बीच से एक बहुत बड़ा सांप बाहर आ गया । चूरु और उसके बेटे को मारने के लिए सांप उनकी तरफ दौड़ा। उन्होंने अपने प्राणों की रक्षा के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की। भगवान शिव के चमत्कार से विशालकाय पत्थरो का एक हिस्सा उस सांप पर जा गिरा, जिससे वह सांप वही मर गया और चूरु तथा उसके पुत्र के प्राण बच गए। कहा जाता है की उसके बाद से ही यहां का नाम चूड़धार पड़ा और लोगों की श्रद्धा इस मंदिर में और अधिक बढ़ गई और यहां के लिए धार्मिक यात्राएं शुरू हुई। एक बहुत बड़ी चट्टान को चूरु का पत्थर भी कहा जाता है जिससे धार्मिक आस्था जुड़ी है।

 

यह भी कहा जाता है कि चूड़धार पर्वत के साथ लगते क्षेत्र मे हनुमान जी को संजीवनी बूटी मिली थी। सर्दियों और बरसात के मौसम में यहां जमकर बर्फबारी होती है। यह चोटी वर्ष के ज्यादातर समय बर्फ से ढकी रहती है।

 

हर साल गर्मियों के दिनों में चूड़धार की यात्रा शुरू हो जाती है। यह चोटी ट्रैकिंग के लिए बेहद ही उपयुक्त है ।

 

परंतु यह चोटी दुर्गम तथा कम प्रचलित होने के कारण बाहरी पर्वतारोहियों के बीच में उतनी महत्वपूर्ण जगह नहीं बना पाई है। धीरे-धीरे बदलाव आना शुरू हो गया है क्योंकि यहां ट्रैकिंग की अपार संभावनाएं हैं।