गिरिपार में तीन दिवसीय बिशू पर्व शुरू, वैशाखी की धूम

बिशू पर बुरांस के फूलों की माला घर के बाहर लगाना शुभ मानते हैं लोग…

 

राजगढ़ जनपद में तीन दिवसीय बैसाखी अर्थात बिशू पर्व बुधवार को पारंपरिक सिड्डू व्यंजन के साथ आरंभ हो गया। बता दें कि गिरिपार क्षेत्र में बीशू अर्थात बैसाखी पर्व को वर्ष का पहला त्योहार माना जाता है। इस पर्व पर कालांतर से आटे के बकरे बनाने की अनूठी परंपरा बदलते परिवेश में भी कायम है। जाने माने वरिष्ठ साहित्यकार एवं लेखक शेरजंग चौहान, वरिष्ठ नागरिक सूरत सिंह चौहान ने बताया कि राजगढ़ जनपद में बीशू का त्योहार संक्रांति से दो दिन पूर्व आरंभ हो जाता है, जिसमें पहले दिन लोगों द्वारा सिड्डू बनाए जाते हैं। इसी प्रकार दूसरे दिन विशेष व्यंजन के रूप में आटे के बकरे बनाए जाते हैं जिसे लोग बड़े चाव से घी के साथ खाते हैं। इस दिन रात्रि को गिरिपार का विशेष व्यंजन असकलियां बनाई जाती हैं। संक्रांति के दिन प्रात: सबसे पहले लोग अपने गांव के कुल देवता के दरबार में बुरांस की माला लगाते हैं। तदोपरांत बुरांस की लडिय़ां अपने घरों में लगाने की परंपरा आज भी कायम है। बैसाख संक्रांति को देवालय और घर पर बुरांस का फूल लगाना बहुत ही शुभ माना जाता है जोकि खुशहाली और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। लोग बुरांस के फूलों को इस त्योहार के लिए जंगलों से ढूंढ कर लाते हैं। गौर हो कि बैसाख की संक्रांति को स्थानीय भाषा में बड़ा साजा कहते हैं।

इस दिन गांव के मंदिरों में विशेष पूजा की जाती है। लोग अपने कुल देवता को चावल की भेंट अर्पित करते हैं। इस दिन लोग अपने घरों में पटांडे और खीर बनाते हैं। इस पर्व पर लोग अपनी बहन व बेटियों को भी विशेष रूप से आमंत्रित करते हैं। शेरजंग चौहान ने बताया कि बिशू पर्व पर आटे के बकरे बनाना भी बहुत शुभ माना जाता है। उन्होंने बताया कि सिड्डू बनाने का प्रचलन भी कालांतर से है। इसी प्रकार चावल के आटे से असकलियां विशेष पत्थर के खांचे में बनाई जाती है जोकि खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होती है। गिरिपार क्षेत्र में बिशू की साजी के अवसर पर कई स्थानों पर मेलों का भी आयोजन होता है। राजगढ़ में बैसाख की संक्रांति पर तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है। उन्होंने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों में वर्ष में पडऩे वाली चार बड़ी साजी का महत्व है।